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समाज, देश और वैयक्तिकता

छुटपन में जब नया नया साइकिल चलाना सीखा था तब सोचता था, काश कुछ ऐसा हो जाए कि बस एक पैडल मारूं और साइकिल चलती ही चली जाए। जब बड़ा हुआ तो पता चला कि साइकिल फ्रिक्शन के चलते तेज नहीं चलती। फिर दिमाग के घोड़े दौड़े और इस नतीजे पर जा पहुंचे कि इसका समूल नाश करना बेहतर होगा। फिर एकदिन फ्रिक्शन का फायदा समझ में आया। ब्रेक कमजोर होने के चलते साइकिल ठुक गई और पहिया टेढ़ा हो गया।

कहने का मतलब दुनिया में कुछ है तो उसका वजूद किसी वजह से ही है और वह वजह अच्छी है या बुरी आप और हम तय करते हैं। लेकिन कई बार यह अच्छी और बुरी चीज का फर्क आपकी और हमारी हद से बाहर निकलकर समाज और देश के अधिकार क्षेत्र में चला जाता है। समाज और देश व्यापक सोच से प्रेरित होता है और बहुमत से चलता है। ऐसे में मान लिया जाता है कि उसको बनाने वाले प्राइमरी यूनिट ‘व्यक्ति’ की राय कोई मायने नहीं रखती क्योंकि वह समाज और देश से ज्यादा अपने बारे में सोचेगा।

देश और समाज की सोच जब संक्रमण काल में पनपती है तो उसमें भावपूर्ण निराधार तर्कों पर आधारित कई तरह की विसंगतियां पानी में शक्कर की तरह घुलमिल जाती हैं। (शरबत किसे अच्छा नहीं लगता, डायबिटीज वालों को छोड़) यही शरबत जब समाज और देश की सबसे बुनियादी इकाई में जबरन बांटी और हलक में उतारी जाने लगती है तो मुजायका खराब होने लगता है। एक तरह से समाज और देश के लिए स्वाभाविक पेय शरबत जैसी मीठी चीज के प्रति वैसे लोगों में अरुचि पैदा होने लगती है जो समाज और देश में अपनी वैयक्तिकता बचाए रखना चाहते हैं।

समाज और देश में ऐसे लोगों का वैधानिक वजूद है लेकिन समाज और देश इस बात को मानने से इनकार करता है क्योंकि उसका मानना है कि जो उसका जबरिया मीठा शरबत पीना तो दूर छूना भी पसंद नहीं करता वो उसका हिस्सा कैसे हो सकता है? लेकिन सच तो है कि समाज और देश में वैयक्तिकता उसी तरह जरूरी है जिस तरह कथित तौर पर देश और समाज का रहन सहन बेहतर बनाने के लिए जरूरी प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देने वाला पूंजीवाद जरूरी है। तो फिर आप जैसे पूंजीवाद को स्वीकार करते हैं तो फिर उसी तरह वैयक्तिक्ता को भी क्यों नहीं गले लगाते हैं।

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