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सफेद न बन सका काला पैसा काफूर



दो साल पहले द हिंदू की एक हेडलाइन मय खबर के मुताबिक इंडिया की ब्लैक इकनॉमी इसकी जीडीपी के 75 पर्सेंट के बराबर है। मतलब हम हर साल जितना पैदा करते हैं उसका सिर्फ 25 पर्सेंट विजिबल होता है, बाकी 75 पर्सेंट इनविजिबल? क्योंकि ये होता तो इकनॉमी का ही हिस्सा है लेकिन इस पर सरकार को टैक्स नहीं मिलता है।

तो ठीक है अगर यह 25 प्रतिशत विजिबल इकनॉमी 14.60 लाख करोड़ रुपये (2015-16) का टैक्स दे रही है तो सोचिए कि अगर पूरी इकनॉमी टैक्स देने लगे तो क्या होगा? टैक्स कलेक्शन चार गुना हो जाएगा? लेकिन अगर हम उसको काबू करने के बजाय खत्म कर दें तो क्या होगा? क्या इकनॉमी की विजिबिलिटी बढ़ जाएगी? क्या टैक्स कलेक्शन में बढ़ोतरी होगी? नहीं।

लेकिन ये जरूर होगा कि सिस्टम से 1000 और 500 रुपये के करेंसी नोट, जिनमें ब्लैक इकनॉमी फंसी है, निकल जाने से सिस्टम में उतने करेंसी नोटों की कमी हो जाएगी। यह एक अंधेरा कोना बनकर रह जाएगा जिसका वजूद तो होगा लेकिन जिसका यूज नहीं हो पाएगा।

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अब 500 रुपये और 2000 रुपये के नए करेंसी नोट की बात करते हैं। सरकार जितने रुपयों के पुराने करेंसी नोटों की रिप्लेसमेंट देती है वह मौजूदा नोटों की संख्या से बहुत कम हुई तो बाजार में कैश की कमी बनी रहेगी। ऐसे में मार्केट में मिल रही किसी एक चीज के पीछे कम पैसे ऑफर किए जाएंगे। फिर स्वाभाविक तौर पर महंगाई में कमी आएगी।

अगर सिस्टम से जितने करेंसी नोट निकल रहे हैं, उतने ही वैल्यूएशन की करेंसी सिस्टम में डाली जाती है (जो नहीं होने जा रहा है) तो महंगाई बढ़ेगी। वह पैसा एक्सेस होगा, क्योंकि ब्लैक मनी का बड़ा हिस्सा सिस्टम में नहीं आ पाएगा। यह जरूर है कि सरकार को उधारी नहीं लेनी होगी और उसके फिस्कल डेफिसिट का बड़ा हिस्सा कवर हो जाएगा।

इन सबके बीच अगर हम एथिक्स में जाते हैं और कहते हैं कि ब्लैक मनी ड्रग्स, ह्यूमन ट्रैफिकिंग और कई गलत चीजों से पैदा होता है और हम उसको मुख्यधारा में शामिल नहीं कर सकते तो यह हमारी अदूरदर्शिता और अव्यवहारिकता होगी। और हमें इकनॉमी शब्द को भूल जाना होगा क्योंकि एथिकल इकनॉमी सिर्फ राम राज्य में मुमकिन है।

जरा सोचिए। 1000 और 500 रुपये के करेंसी नोट चलन से हटा दिए जाने से हमारी ‘ब्लैक इकनॉमी’ का कितना हिस्सा हम खो देंगे जो अंतत: इकनॉमी का हिस्सा बन सकता था लेकिन सरकार के इस कदम के चलते पकड़े जाने के डर लोग उसको फॉर्मल सिस्टम में नहीं लाएंगे और वह कूड़ा का कूड़ा रह जाएगा।

इस तरह अब तक जमा होती रही ब्लैक मनी जिसको लोग विदेश नहीं भेज पाए या जिसको लोगों ने भेजना नहीं चाहा, एक बार में खत्म तो हो जाएगी लेकिन वह अनुकूल मौका मिलने पर दिन दूनी रात चौगनी बढ़ेगी।

अगर सरकार कहती है कि वह 500 सौ का नोट जाली नौटों को सिस्टम से निकालने के मकसद से ला रही है तो एक बार आप और हम भरोसा कर भी लें। लेकिन अगर वह 1000 रुपये की जगह 2000 रुपये के नए करेंसी नोट ला रही है तो ज्यादा डिनॉमिनेशन के करेंसी नोट से भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलने की थ्योरी को सरकार झुठला रही है? ऐसा नहीं है क्या?

सोचने में आपका कुछ नहीं जाएगा। इसमें कम से कम रुपये तो नहीं खोएंगे आप?

Puspendra Kumar

Interested in content curation works, data Journalism and info-graphical presentation on news portals. Share, Banking, Insurance and commodity stories Editing. Stock fundamental and technical analysis.

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